“क्रियात्मक अनुसंधान” — यह शब्द सुनते ही ज़्यादातर शिक्षकों के मन में एक मोटी फ़ाइल आती है: उद्देश्य, परिकल्पना, न्यादर्श, उपकरण, सांख्यिकी… और फिर एक गहरी साँस: यह मेरे बस का नहीं।
पर सच यह है कि आप यह काम पहले से कर रहे हैं।
जब आपने देखा कि पीछे बैठे बच्चे ध्यान नहीं देते, और आपने उन्हें आगे बिठाया — और फिर ग़ौर किया कि फ़र्क़ पड़ा या नहीं — वही Action Research था। बस उसे लिखा नहीं गया।
यह विचार कहाँ से आया
“Action Research” शब्द 1940 के दशक में सामाजिक मनोवैज्ञानिक कर्ट लेविन (Kurt Lewin) ने दिया। 1946 के अपने लेख में उनका कहना था कि ऐसा शोध काम का नहीं जो सिर्फ़ किताबें पैदा करे; शोध ऐसा हो जो काम को बदले। उनके शब्दों में, “Research that produces nothing but books will not suffice.”
लेविन ने इसे सीढ़ी की तरह देखा: योजना बनाओ, करो, देखो क्या हुआ, फिर अगली योजना। बाद में शिक्षा-शोधकर्ता स्टीफ़न केमिस और रॉबिन मैकटैगार्ट ने इसे शिक्षकों के लिए एक चक्र के रूप में लिखा:
योजना → करना → देखना → सोचना → फिर नई योजना
यानी Action Research शिक्षक का अपना, अपनी कक्षा के लिए, अपने हाथों से किया गया छोटा प्रयोग है।
सुयोग का तरीका: सिर्फ़ तीन सवाल
हमने इसे इतना आसान रखा है कि व्यस्त दिन में भी हो जाए। शुरुआत में सिर्फ़ तीन सवाल:
1. क्या परेशान कर रहा है? एक वाक्य में। जैसे: “कक्षा 8 के आधे बच्चे होमवर्क नहीं लाते।”
2. क्या आज़माएँगे? एक छोटा, रोज़ का बदलाव। जैसे: “होमवर्क सिर्फ़ 3 छोटे सवाल, एक आसान से शुरू; अगले दिन 5 मिनट साथी-जाँच।”
3. कैसे पता चलेगा कि फ़र्क़ पड़ा? कोई एक गिनती। जैसे: “होमवर्क करके लाने वाले बच्चों का प्रतिशत।”
फिर 2 से 4 हफ़्ते सामान्य ढंग से पढ़ाइए। हफ़्ते में एक बार देखिए और लिखिए कि क्या हुआ।
एक उदाहरण: होमवर्क की परेशानी
मान लीजिए कक्षा 8 में 40 बच्चे हैं।
| समय | होमवर्क लाने वाले | प्रतिशत |
|---|---|---|
| शुरुआत से पहले | 18 | 45% |
| सप्ताह 1 | 24 | 60% |
| सप्ताह 2 | 29 | 73% |
| सप्ताह 3 | 33 | 83% |
(यह एक समझाने वाला उदाहरण है, किसी असली कक्षा के आँकड़े नहीं।)
तीन हफ़्ते बाद शिक्षक तीन बातें लिखते हैं:
- क्या काम आया: छोटा होमवर्क और साथी-जाँच। बच्चों को लगा कि होमवर्क “हो सकता है”।
- क्या काम नहीं आया: सात बच्चे अब भी नहीं लाते — उनमें से चार खेत के काम में हाथ बँटाते हैं।
- आगे क्या: उन सात से अकेले में बात, और उनके लिए होमवर्क का कुछ हिस्सा स्कूल में ही।
बस — यही पूरा Action Research है। और ध्यान दीजिए: दूसरे चक्र की योजना पहले चक्र की सीख से निकली।
कल से कैसे शुरू करें
- आज अपनी किसी एक कक्षा की एक परेशानी चुनिए। सबसे बड़ी नहीं — सबसे साफ़।
- उसकी आज की गिनती लिख लीजिए। यही आपका “पहले” है।
- एक छोटा बदलाव तय कीजिए जो रोज़ 5–10 मिनट में हो सके।
- कैलेंडर में तीन हफ़्ते बाद की तारीख़ पर लिख दीजिए: देखना है।
आम गलतियाँ
बहुत बड़ी समस्या चुनना। “बच्चों की पढ़ाई सुधारनी है” Action Research नहीं, सपना है। “कक्षा 6 के 15 बच्चे धाराप्रवाह नहीं पढ़ते” — यह शुरुआत है।
एक साथ पाँच बदलाव। फिर पता नहीं चलता कि असर किसका था। एक बार में एक बदलाव।
गिनती भूल जाना। “मुझे लगता है सुधार हुआ” काफ़ी नहीं। एक छोटी गिनती आपके काम को सबूत देती है — और आपको भी भरोसा देती है।
फ़ाइल को बोझ बना लेना। औपचारिक प्रतिवेदन तभी बनाइए जब ज़रूरत हो (प्रशिक्षण, निरीक्षण, प्रतियोगिता)। असली काम कक्षा में है, काग़ज़ में नहीं।
आपके लिए
एक मिनट रुककर सोचिए: पिछले साल आपने कक्षा में कौन-सा बदलाव किया था जिससे फ़र्क़ पड़ा? अगर उसे लिखा होता, तो आज वह आपका पहला Action Research होता।
इस बार लिखिए।
प्रिय शिक्षक, शोध सिर्फ़ विश्वविद्यालयों में नहीं होता। हर वह शिक्षक शोधकर्ता है जो अपनी कक्षा को ध्यान से देखता है, कुछ नया आज़माता है, और ईमानदारी से मानता है कि क्या चला और क्या नहीं।
आपकी कक्षा आपकी प्रयोगशाला है — और उसमें सबसे क़ीमती चीज़ आपका ध्यान है।
स्रोत
- Lewin, K. (1946). Action Research and Minority Problems. Journal of Social Issues, 2(4), 34–46. परिचय: infed.org — What is action research?
- Kemmis, S., & McTaggart, R. (1988). The Action Research Planner. Deakin University Press. चक्र का सार: CASRAI — What is Action Research?
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